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तुम मेरी कहानी नहीं जानते

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तुमने दोस्ती का हाथ बढ़ाया और हम दोस्त हुए, पर तुम दोस्ती का उसूल नहीं जानते। जो तुम्हारे जज़्बात समझे और ताउम्र साथ दे, तुम ये दोस्ती का नियम नहीं जानते। तुम समझते हो वही बात जो मैंने बयां की है, तुमने शब्द सुने हैं, मेरे अल्फ़ाज़ नहीं जानते। और तुम मेरी आँखें पढ़ो, यह आख़िरी उम्मीद बची है, तुम मेरी उम्मीदों का सिलसिला नहीं जानते। इस दुनिया ने नामक लगाकर नापे हैं मेरे ज़ख़्म, तुम मेरी पुकार, मेरी चीखें नहीं जानते। इंसानियत बेच खाई है यहाँ सभी ने, तुम बस मुखौटे जानते हो, चेहरे नहीं जानते। जिन्हें तुम अपना कहते हो, वो ज़ुबान पे शहद, दिल में ज़हर रखते हैं। तुम बस मेरी उम्र जानते हो, मेरा तजुर्बा नहीं जानते। देखो, मेरे साथ चलोगे तो हर पल, हर कदम मौत है, तुम सिर्फ जीना जानते हो, मरना नहीं जानते। कई दफ़ा कोशिश की तुम्हें दास्तां-ए-दिल सुनाने की, और वक्त का तकाज़ा देखो, कि तुम न कोई कहानी कोई किस्सा नहीं जानते। हर पल कोशिश की मैंने खुद को ज़िंदा रखने की, तुम घाव तो जानते हो, पर मन के ज़ख्मों की गहराई नहीं जानते। हर चमकती चीज को हीरा क्यों समझते हैं लोग? लोग पीतल और सोने की परख नह...

इतिहास के आईने में राजनीति

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          मैं सोनाली हूँ और मैं औरंगाबाद से हूँ। मैं छब्बीस साल की हूँ। बचपन से लेकर आज तक जब किसी ने मुझसे पूछा कि “तुम कहाँ से हो ?”, तो मैंने हमेशा यही कहा—“औरंगाबाद से हूँ।” कुछ ही दिनों पहले मेरे शहर का नाम बदल दिया गया है। अब औरंगाबाद को ' छत्रपति संभाजीनगर ' कहा जाता है। और न जाने देश में कितने ही शहरों के नाम बदले जा चुके हैं। हम इस शहर से उतना ही प्यार करते हैं , जितना पहले करते थे। यहाँ की न जाने कितनी पीढ़ियाँ इस शहर को ' औरंगाबाद ' नाम से जानती हैं। महाराष्ट्र के बाहर भी यह शहर ' औरंगाबाद ' नाम से ही पहचाना जाता है। दरवाज़ों का शहर , अजंता और एलोरा की गुफाओं वाला औरंगाबाद , बीबी का मकबरा , दौलताबाद का किला , ग्रिश्नेश्वर मंदिर , जामा मस्जिद , हिमायत बाग , पंचक्की और सलीम अली झील जैसी धरोहरें—यह सब औरंगाबाद की पहचान है। अब यह शहर ' छत्रपति संभाजीनगर ' कहलाता है , और मुझे इस पर गर्व है। मैं एक महाराष्ट्रीयन लड़की हूँ और अपने इतिहास को जानती हूँ। जिस प्रकार संभाजी महाराज की हत्या औरंगज़ेब के आदेश पर हुई , वह घटना इंसानियत पर कलंक थी। इस भूमि ने ...

आम्ही लॉकडाऊन पीडित

मी सोनाली. एक सर्व सामन्य मुलगी. मराठी माध्यमात शिकलेली. खूप लहान वयात वाचनाची आवड जडली. पुस्तकं वाचणे, वृतपत्राचा आढावा घेणे, त्यावर सखोल चर्चा करणे, मग त्यावर आपल्याला नक्की काय वाटतं आहे आपलं नक्की काय मत आहे हे लिहायला लागले. हीच आवड वय आणि वेळेसोबत वाढतच गेली. वाचन हे विचारांना धार देत गेलं. स्वतःची स्वतंत्र्य मतं तयार होत गेली. मग ती व्यक्त करण्याची धडपड सुरु झाली. आपली मत मांडायची म्हटल तर ती अशीच कुठे ही मांडता येत नसतात हे खूप कमी वयात लक्षात आलं. त्यासाठी एक योग्य व्यासपीठ हवं हे ही समजलं. मग शाळेत असतानाच आपण एक लेखिका, कवयत्री, वक्ता, रेडिओ जॉकी, किंवा उत्तम वृत निवेदिका व्हावं असं वाटू लागलं. शाळेत असताना वर्गात कुणी विचारलं की मोठं झाल्यावर तुला काय व्हायचं आहे ? तर सर्वाची नेहमीची उत्तर ठरलेली असायची. डॉक्टर, वकील, इंजिनिअर, किंवा अंतराळवीर... मी मात्र दिमाखात सांगणार उत्तम लेखिका किंवा पत्रकार... काही तरी वेगळं उत्तर आलं की शिक्षकांना कौतुक वाटायचं. मलाला, सुहास शिरवळकर, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, महात्मा फुले, सावित्रीबाई फूले, ताराबाई शिंदे, बुद्ध, संत कबीर, संत तुकाराम म...

स्वप्न की सत्य...!

    मी सोनाली. एक सर्व सामन्य मुलगी. मराठी माध्यमात शिकलेली. खूप लहान वयात वाचनाची आवड जडली. पुस्तकं वाचणे, वृतपत्राचा आढावा घेणे, त्यावर सखोल चर्चा करणे, मग त्यावर आपल्याला नक्की काय वाटतं आहे आपलं नक्की काय मत आहे हे लिहायला लागले. हीच आवड वय आणि वेळेसोबत वाढतच गेली. वाचन हे विचारांना धार देत गेलं. स्वतःची स्वतंत्र्य मतं तयार होत गेली. मग ती व्यक्त करण्याची धडपड सुरु झाली. आपली मत मांडायची म्हटल तर ती अशीच कुठे ही मांडता येत नसतात हे खूप कमी वयात लक्षात आलं. त्यासाठी एक योग्य व्यासपीठ हवं हे ही समजलं. मग शाळेत असतानाच आपण एक लेखिका, कवयत्री, वक्ता, रेडिओ जॉकी, किंवा उत्तम वृत निवेदिका व्हावं असं वाटू लागलं. शाळेत असताना वर्गात कुणी विचारलं की मोठं झाल्यावर तुला काय व्हायचं आहे ? तर सर्वाची नेहमीची उत्तर ठरलेली असायची. डॉक्टर, वकील, इंजिनिअर, किंवा अंतराळवीर... मी मात्र दिमाखात सांगणार उत्तम लेखिका किंवा पत्रकार... काही तरी वेगळं उत्तर आलं की शिक्षकांना कौतुक वाटायचं. मलाला, सुहास शिरवळकर, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, महात्मा फुले, सावित्रीबाई फूले, ताराबाई शिंदे, बुद्ध, संत कबीर, ...

कैसे लिखू और क्या लिखूं...?

कैसे लिखू और क्या लिखूं...? देखनेवालो की नजर लिखू या इस समाजका नजरिया लिखू ? बिगड़े हालात लिखू या बिगड़ती हर बात लिखू ? खुद कुछ कहु या सामने वाले कि कही हर बात लिखू ? बस... सोच रही हु क्या लिखू...?      सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग लिखू या इंस्टाग्राम की स्क्रॉलिंग लिखू ? मेरा ढलता दुप्पटा लिखू या दुप्पटा ना लेनेकी कहानी लिखू...? बस सोच रही हु क्या लिखूं..?      घर की खुशहाली लिखू या खुशहाली मैं ठहरा अकेलापन लिखू ? गंदी नजर से आयी झिझक लिखू या उसपर आये गुस्से को लिखू ? जो साथ है उसके बारे मैं लिखू या जो चला गया उसके यादोंको लिखू ? बस सोच रही हु क्या लिखू...?       खुद के सपनो को लिखू या बिखरते अपनोको लिखू ? अपने पराये का फर्क लिखू या अपनासा लगने वाला पराया शक्स लिखू ? सपनोवाली आज़ादी लिखू या मैं आज़ाद हु इस वहम को लिखू ? बस सोच रही हु क्या लिखू ?      टूटते बिखरते आसमाँ का वो सफर लिखू या जो गिरने पर मेरे पंखोको सेहेलाये वो हमसफ़र लिखू ? मेरी खाइशें लिखू या सबकी उम्मीदे लिखू या हसती सूरत की बिखरी हर कहानिया लिखू ? या कहानियों की दास्त...

Strength of writing .... ✍

     What to say about writing and how much to say? No matter how much you say and write, its less. The art through which we express ourselves and often raise voice in a way that society never allows us to speak. In fact, many writers, poets, have written on many issues and faced many problems. And what are those issues? We know that very well...!       Everyone has an equal right to express what they think. Journalists express themselves through print and electronic media. And with the help of writing one can also represent all the problems of the people. Many people are also expressing their ideas through newspaper, magazine, quarterly and it is from this article that we are broadening our own knowledge.      Someone has really said that the edge of a sword and the power of a pen can never be equal. At a time when women were not allowed to read, write, or get an education for women's issues, many women writers came forward against the ...

आत्मविश्वास

कहानि है.. निहारिका की।  उसेके पति को इस दुनिया से जाकर आज पंधरा दिन हो गए थे। घर की सारी चेहेल पहल भी शांत हो चुकी थी। उसके ससुराल के मायके के सारे रिश्तेदार अन्त्यसंस्कार को 13 दिन पूरे होते ही चले गए थे। कब ये सब खत्म हो मानो जैसे वो इसी बात का इंतजार कर रहे हो। वरुण का ऐसे अचानक चले जाना इस बात के लिए उससे ही दोषी ठहराया जा रहा था। सारा को गोद मे लिए वो शांत सी गैलेरी मैं बैठी थी। उसे अब ये सारी जिंदगी खालीखालीसी लगने लगी थी। जैसे वो कही खो सी गई हो।  song  Door bel..... अचानक बजे डोरबेल के आवाज से वो होश मैं आई। दरवाजा खोला तो सामने छोटा देवर खड़ा था। भाभी काम के सिलसिले मैं पूना जा रहा हु। आपकी इजाजत हो तो गाड़ी लेकर जाऊ...? उसने दरवाजेमैं खड़े रहकर ही पूछा। उसने बिना कुछ कहे गाड़ी की चाबी देवर को देदी। जब उन्होंने एक्टिवा लि थी तब तो सारा का जन्म भी नही हुआ था। वो हमेशा कहा करते थे कि तूम भी स्कूटी चलना शिख लो। पर उनकी बाते सुनकर नेहा हमेशा कहती थी कि आप हो ना तो मुझे ये सीखनेकी क्या जरूरत है? फिर सारा का जन्म होने के बाद कार ली। पर नेहा को येसब सीखना पसंद नही था। उ...