इतिहास के आईने में राजनीति

मैं सोनाली हूँ और मैं
औरंगाबाद से हूँ। मैं छब्बीस साल की हूँ। बचपन से लेकर आज तक जब किसी ने मुझसे
पूछा कि “तुम कहाँ से हो?”, तो
मैंने हमेशा यही कहा—“औरंगाबाद से हूँ।” कुछ ही दिनों पहले मेरे शहर का नाम बदल
दिया गया है। अब औरंगाबाद को 'छत्रपति संभाजीनगर' कहा
जाता है। और न जाने देश में कितने ही शहरों के नाम बदले जा चुके हैं।
हम इस शहर से उतना ही
प्यार करते हैं, जितना
पहले करते थे। यहाँ की न जाने कितनी पीढ़ियाँ इस शहर को 'औरंगाबाद' नाम से जानती हैं। महाराष्ट्र के बाहर भी यह शहर 'औरंगाबाद' नाम से ही पहचाना जाता है। दरवाज़ों का शहर, अजंता और एलोरा की गुफाओं वाला
औरंगाबाद, बीबी
का मकबरा, दौलताबाद
का किला, ग्रिश्नेश्वर
मंदिर, जामा
मस्जिद, हिमायत
बाग, पंचक्की और सलीम अली झील जैसी
धरोहरें—यह सब औरंगाबाद की पहचान है।
अब यह शहर 'छत्रपति संभाजीनगर' कहलाता है, और मुझे इस पर गर्व है। मैं एक
महाराष्ट्रीयन लड़की हूँ और अपने इतिहास को जानती हूँ। जिस प्रकार संभाजी महाराज
की हत्या औरंगज़ेब के आदेश पर हुई, वह घटना इंसानियत पर कलंक थी। इस भूमि ने अपना राजा खोया था। यह मराठा इतिहास
की सबसे अमानवीय घटनाओं में से एक थी।
मराठी लोग अपने इतिहास
के प्रति सहिष्णु हैं और होना भी चाहिए। यही कारण है कि लंबे समय से यह चर्चा चलती
रही कि इस शहर का नाम औरंगाबाद नहीं होना चाहिए। और अब, आखिरकार, यह 'छत्रपति संभाजीनगर' बन गया है।
मगर फिलहाल, चर्चा केवल नाम तक सीमित नहीं
है। अब यह खबर उठ रही है कि औरंगज़ेब की समाधि को हटाया जाए। इससे कई स्थानों पर
दंगे हुए, धार्मिक
और जातीय हिंसा भड़की। हिंदू-मुस्लिम मुद्दों को एक बार फिर हवा दी गई। मीडिया को
भी इससे नई सुर्खियाँ मिल गईं।
पर असली सवाल यह है कि
यह सब करवा कौन रहा है? और
क्यों? इनका
उद्देश्य क्या है? और
हमें क्या दिखाया जा रहा है, जबकि वास्तव में उनके पास क्या है, ये देखने की ज़रूरत आज के युवाओं और इस देश के सभी जागरूक नागरिकों को है।
वर्तमान समय में देश में
कई महत्वपूर्ण समस्याएँ हैं, लेकिन नाम बदलने जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। किसी भी शहर का
नाम बदलने से उसका इतिहास नहीं बदलता। उस शहर की संस्कृति, लोगों की यादें और वहाँ की
ऐतिहासिक धरोहरें उस नाम से जुड़ी होती हैं। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि
वहाँ रहने वाले लोगों का भविष्य क्या होगा—इस पर कोई चर्चा नहीं करता।
आज छत्रपति संभाजीनगर
में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है। युवाओं को अच्छे अवसर नहीं मिल रहे, शिक्षा प्रणाली में सुधार की
आवश्यकता है, बुनियादी
सुविधाओं का विकास अधूरा है, लेकिन ये मुद्दे राजनीतिक एजेंडे में कहीं नहीं हैं। क्या नाम बदलने से शहर
बदल जाएगा? क्या
नाम बदलने से आर्थिक स्थिति सुधर जाएगी? यही असली सवाल हैं।
इतिहास पर नज़र डालें तो
यह साफ़ होता है कि किसी भी शहर का नाम बदलना एक राजनीतिक एजेंडा होता है। इसके
पीछे कोई ठोस नीति नहीं होती। नाम बदलने के पीछे ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने की
बात की जाती है, लेकिन
असल में यह केवल राजनीतिक लाभ उठाने का माध्यम बन जाता है।
इतिहास हमें सिखाने के
लिए होता है, न कि
प्रतिशोध या नफ़रत फैलाने के लिए। इतिहास से हम अपनी गलतियों से सीख सकते हैं, ताकि भविष्य में उन्हें न
दोहराएँ। जैसे छत्रपति संभाजी महाराज ने साहस और निष्ठा से संघर्ष किया, वैसे ही हमें भी आज के मुद्दों
से लड़ना चाहिए—शिक्षा, रोज़गार, और सामाजिक विकास के लिए।
अंत में, सवाल यही है: हम किस बात को
अधिक महत्व दें? नाम
बदलने की राजनीति को या अपने शहर और देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए आवश्यक मुद्दों
को?
सोनाली अहिरे
कस्तूरी_मन
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