मैं किताब लिखूंगी..
मै जब कभी खुद के लिए किताब लिखूँगी
मै खुदकों सामर्थ्य का उच्चतम शिखर लिखूँगी
कभी सही कभी गलत कभी टूटे कुछ सपने लिखूँगी
ओर जो टूटे वो टूटे बाकी ख्वाब सारे हजार लिखूँगी ।
जब सुर्ख गालों पर आँसू छलके मै वो पल लिखूँगी
मै मेरा छिना गया हर पसंदीदा खिलौना लिखूँगी
मै हर अनकहा सवाल सवालों की हर एक कड़ी लिखूँगी
अगर न दे सका जवाब कोई, तो मैं हर जवाब खुद रचूँगी ।
मै सदीओ का स्त्री पुरुष भेदभाव लिखूँगी
मै किचन बिती औरतों की आधी उम्र लिखूँगी
जब लड़के रो न सके मै हर वो ख्याल लिखूँगी
जो प्रश्न करे मै हर वो सारे तर्क लिखूँगी।
औरतों के अस्तित्व पर उठा हर सवाल लिखूँगी
जानवरोसे भी बत्तर हर अपमान अवहेलना लिखूँगी
मै भावनाहीन हर उस मर्द को कमजोर लिखूँगी
मै पित्रसत्ता से हुआ पुरुषों का भी नुकसान लिखूँगी।
और मै अपना आँगन अपना भी एक घर लिखूँगी
शायद अपने पंख और आधा आसमान लिखूँगी
इस दुनिया से परे अपना कोई जहांन लिखूँगी
जहाँ मैं किसी को भगवान नहीं, पहले इंसान लिखूँगी।
मै जब कभी खुद के लिए किताब लिखूँगी
मै जब कभी खुद के लिए किताब लिखूँगी…!
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